इतने पुस्तकों का प्रकाशन होने के उपरांत भी बिहार विभूति आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा का अप्रकाशित साहित्य संसार अभी भी इतना विस्तृत है कि कभी कभी मैं सोचता हूँ कि क्या मैं उन सभी अमूल्य शाश्वत रचनाओं का संकलन कर, पुनसृजन कर, टंकण कर, संपादन कर आपके समक्ष प्रस्तुत कर सकूंगा? बहुत ही कठिन कार्य है ये, बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है ये, बहुत ही दुष्कर।
पर करना तो है ही। नहीं तो भारत का हिंदी साहित्य और समृद्ध कैसे होगा? नहीं तो भारतीय संस्कार और संस्कृति के अनमोल तत्व आप तक कैसे पहुंचेंगे? नहीं तो नागरी लिपि का प्रचार-प्रसार कैसे होगा? है न! इसीलिए तो मैं उम्र के इस पड़ाव पर भी एक विद्यार्थी की भांति परिश्रम कर रहा हूँ। आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा की हस्तलिखित रचनाओं को संग्रहित कर सुरक्षित तरीके से रख रहा हूँ रजिस्टर फट रहे हैं, पन्ने पीले हो गए हैं चिथड़े-चिथड़े हो रहे हैं, यही नहीं कागज के प्रेमी कीड़े भी इसको चाटने में लगे हुए हैं अगर सावधानी नहीं बरती जाए, सावधानी से रखा नहीं जाए, सावधानी से पन्ने पलटे नहीं जाएं तो सब कुछ मिनटों में नष्ट हो जाएगा, बर्बाद हो जाएगा आचार्य ओझा का परिश्रम से लिखा गया अमूल्य रचनाओं का साहित्य संसार पल भर में लुप्त-विलुप्त हो जाएगा।......