चम्पारन के लोक-हृदय और सांस्कृतिक
चेतना का काव्य-स्वर
साहित्य जब अपनी माटी की सोंधी गंध और युगों पुरानी सांस्कृतिक विरासत से ऊर्जा लेता है, तो वह कालजयी बन जाता है। ऐतिहासिक और साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत उर्वर भूमि चम्पारण के मनीषी कवि परम आदरणीय पं. चतुर्भुज मिश्र जी का आगामी काव्य-संग्रह इसी पावन माटी की रचनात्मक अभिव्यक्ति है। 70 से अधिक वसंत देख चुकी उनकी सघन जीवन-दृष्टि और अनवरत साहित्य-साधना का मधुर फल है यह संग्रह, जिसकी पांडुलिपि से गुज़रना मेरे लिए किसी आत्मिक और वैचारिक तीर्थ-यात्रा से कम नहीं रहा।
संग्रह का कलेवर और बहुआयामी कथ्य
इस संग्रह में संकलित कविताएँ अपनी प्रकृति में 'गागर में सागर' की तरह हैं। संख्या की दृष्टि से लघु दिखने वाली ये रचनाएँ अपने भीतर भावों का एक अनंत महासागर समेटे हुए हैं। मिश्र जी की काव्य-यात्रा का फलक अत्यंत विस्तृत है। संग्रह का प्रारंभ सनातन परंपरा के अनुरूप 'वन्दना', 'जय मात सरस्वती', 'माँ भवानी' और 'नमस्तुभ्यं सरस्वती' जैसी भक्ति-रस से सराबोर रचनाओं से होता है, जहाँ कवि का अंतर्मन एक निश्छल साधक के रूप में ईश्वर के चरणों में निवेदित दिखता है। 'शिव-शम्भू' और 'जय जय केदारा' जैसी कृतियाँ पाठक के भीतर एक सात्त्विक ऊर्जा का संचार करती हैं।
परंतु मिश्र जी केवल अतीत या अध्यात्म के कवि नहीं हैं; वे अपने समय और समाज के प्रति पूर्णतः सजग रचनाकार हैं। जहाँ एक ओर वे 'बिहार गान' और 'आज़ादी' जैसी कविताओं में राष्ट्र और प्रांतीय अस्मिता को स्वर देते हैं, वहीं 'मस्ताना जी' और 'दिनकर के प्रति' जैसी रचनाओं के माध्यम से अपने समकालीन एवं पूर्ववर्ती साहित्याकाश के नक्षत्रों के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता और साहित्यिक आदर प्रकट करते हैं।