महल-झोंपड़ी

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महल-झोंपड़ी

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श्री सत्य नारायण विजय 'विभाकर' का काव्य-संग्रह 'महल-झोंपड़ी' मैंने पड़ा। काव्य-संग्रह का जो नाम कवि ने दिया है संग्रह की कविताओं में इस शीर्षक को कवि ने पूर्णतः साकार भी किया है। काव्य की आधुनिक और पारम्परिक सभी मान्यताओं से मुक्त होकर कवि ने अपने मन के भावों की अभिव्यक्ति के लिये अपने ही मीटर का स्वयं निर्माण किया है और कवि विभाकर के मीटर में भावों को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त करने की क्षमता है। कवि विभाकर की सभी रचनाएं साधारण शिक्षित व्यक्ति पढ़कर कवि के भावों को आत्मसात् कर लेता है। कवि विभाकर के काव्य में कबीर की सी सरलता है। निराला जैसी सामर्थ्य है। कवि विभाकर के काव्य को दुरुहता छू भी नहीं पायी है। कवि विभाकर ने वंचितों के प्रति सहानुभूति दिखाई है और आशा व्यक्त की है कि महलों से सहृदयता की सरिता झोपड़ियों तक पहुंचे। राष्ट्रीयता की भावना भी कवि में कूट-कूट कर भरी है जो उनकी कई कविताओं में फूट पड़ी है। कवि का यह काव्य-संग्रह आज के युग की समस्याओं का दिग्दर्शन है। समस्याओं से निजात पाने के लिये यह काव्यसंग्रह समाधान की शक्ति प्रदान करता है। निश्चय ही कवि का यह काव्य-संग्रह पठनीय एवं संग्रहणीय है। आज के मानव को यह किसी भी समस्या से ग्रस्त होने पर उस समस्या के समाधान तक ले जाकर उसके जीवन को आनन्द की अनुभूति प्रदान करता है।