Rigveda : ऋग्वेद

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Rigveda : ऋग्वेद

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इतने विस्तृत और वृहद ग्रंथ को अल्पकाय पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करना था, अत: सार-संक्षेप-प्रवृत्ति वर्णित विषय को एक जगह करके संक्षेप रूप में ही प्रकट किया गया है । जैसे मान लीजिए, अध्याय में ‘अग्नि’ से सम्बन्धित सूक्त वश हैं, किन्तु वे एक क्रम में न होकर अलग-अलग बिखरे हैं, तो हमने उन सबको एक जगह करके संक्षेप में प्रस्तुत किया है । ऋग्वेद विज्ञानकांड का ग्रंथ है । ऋग्वेद शब्द दो शब्दों के मिलने से बना है- ऋक् और वेद । ऋक् शब्द संस्कृत की ऋच् धातु से बना है । ऋच् धातु का अर्थ है-स्तुति । स्तुति का अर्थ हैं-गुण और गुणी का वर्णन और गुण तथा गुणी का वर्णन-विश्लेषण-प्रतिपादन ही विज्ञान का विषय है; इसीलिए ऋग्वेद को विज्ञानकांड का ग्रन्थ माना जाता है । विज्ञान में ज्ञान, कर्म, उपासना सभी विद्यमान रहते है । अत: ऋग्वेद के मन्त्रों में भी ये तीनों है ।

ऋग्वेद में दस हजार पांच सौ नवासी मन्त्र है जो कि दस सौ अट्ठाईस सूक्तों के रूप में प्रकट किए गये है । सूक्त का अर्थ हैं-सुन्दर कथन-सु+उक्त= सूक्त । सूक्त में कई मन्त्र होते हैं जिनमें कोई बात सुन्दरता से कही गयी होती है, इसीलिए ऐसे मन्त्र-समूह को जिसमें कोई वर्णन सुन्दरता से किया गया हो, सूक्त कहा जाता है ।