भारतीय समाज की सबसे गहरी विडंबना यह है कि यहाँ दर्शन की परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है, किंतु मनुष्य का एक बड़ा हिस्सा आज भी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृत्तिक हाशिए पर खड़ा दिखाई देता है। एक ओर उपनिषदों में "सर्व खल्विदं ब्रह्म" की उद्घोषणा है, बुद्ध के करुणा-सूत्र हैं, भक्ति परंपरा की समता-साधना है, और आधुनिक काल में गांधी तथा आंबेडकर जैसे चिंतकों का नैतिक संघर्ष है; दूसरी ओर जात्ति, वर्ग, लिंग, श्रम और क्षेत्र के आधार पर गहराता हुआ बहिष्करण है। यह विरोधाभास केवल सामाजिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि गहराई से दार्शनिक है। इसी विरोधाभास से यह पुस्तक जन्म लेती है।
"हाशिए पर खड़ा मनुष्य" कोई अमूर्त अवधारणा नहीं है। वह वास्तविक मनुष्य है, जिसकी पहचान, श्रम, देह और आवाज़ को बार-बार गौण बना दिया गया है। वह खेत में काम करने वाला श्रमिक हो सकता है, शहरी झुग्गियों में रहने वाला प्रवासी मजदूर, आदिवासी अंचलों में विस्थापन झेलता समुदाय, जातिगत उत्पीड़न से जूझता दलित, या पितृसत्तात्मक संरचनाओं में सीमित की गई स्त्री। यह हाशिया किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है; यह सत्ता, संरचना और संस्कृति द्वारा निर्मित एक ऐसी स्थिति है, जिसमें मनुष्य को धीरे-धीरे सामाजिक दृश्यता से बाहर धकेल दिया जाता है।
इस संदर्भ में दर्शन की भूमिका केवल व्याख्यात्मक नहीं रह जाती। दर्शन यदि केवल ग्रंथों, संकल्पनाओं और ऐतिहासिक परंपराओं तक सीमित रह जाए, तो वह अपने मूल उद्देश्य से विमुख हो जाता है। दर्शन का केंद्रीय सरोकार सदैव मनुष्य, उसकी गरिमा, उसकी पीड़ा और उसके मुक्ति-प्रश्न से रहा है। इसलिए यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि क्या भारतीय दर्शन आज के सामाजिक यथार्थ में हाशिए पर खड़े मनुष्य के पक्ष में कोई नैतिक हस्तक्षेप कर सकता है? क्या वह केवल अतीत की बौद्धिक विरासत है, या वर्तमान के लिए भी एक जीवित नैतिक संसाधन ?
यह पुस्तक इसी प्रश्न को अपना केंद्रीय विंदु बनाती है। इसका उद्देश्य भारतीय दर्शन को एक ऐसे आलोचनात्मक और नैतिक ढाँचे के रूप में पुनः पढ़ना है, जो समकालीन सामाजिक अन्याय को समझने और चुनौती देने की क्षमता रखता हो। यहाँ भारतीय दर्शन को न तो आदर्शवादी रोमांटिसिज्म में प्रस्तुत किया गया है, और न ही उसे पूरी तरह अस्वीकार किया गया है। इसके बजाय, इसे एक जटिल परंपरा के रूप में देखा गया है, जिसमें मुक्ति और बहिष्करण, करुणा और अनुशासन, समता और असमानता, सभी तत्व एक साथ उपस्थित हैं।
हाशिए की अवधारणा स्वयं में एक आधुनिक सामाजिक संकल्पना प्रतीत होती है, किंतु इसके बीज भारतीय सामाजिक संरचना में बहुत पुराने हैं। वर्ण-व्यवस्था, श्रम का नैतिक अवमूल्यन, शुद्धता अशुद्धता की धारणाएँ और स्त्री की सामाजिक स्थिति जैसे प्रश्न प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में मौजूद रहे हैं। दर्शन इन संरचनाओं से अछूता नहीं रहा। कई बार उसने इन्हें वैधता दी, और कई बार इन्हें चुनौती भी दी। यही द्वंद्व इस पुस्तक का विश्लेषणात्मक आधार है।
उपनिषदों में आत्मा की सार्वभौमिकता की बात एक गहन मानवीय दृष्टि प्रस्तुत करती है, परंतु यह दृष्टि सामाजिक जीवन में समान रूप से लागू नहीं हो पाती। स्मृति परंपरा धर्म को सामाजिक कर्तव्यों से जोड़ती है, किंतु वही धर्म कई बार असमानताओं को स्थिर करने का माध्यम भी बन जाता है। बुद्ध का दर्शन इस संदर्भ में एक नैतिक विद्रोह के रूप में सामने आता है, जो दुःख को सार्वभौमिक मानवीय अनुभव मानकर करुणा और समता की नींव रखता है। भक्ति आंदोलन सामाजिक हाशिए से उठी वह दार्शनिक आवाज़ है, जिसने ईश्वर के नाम पर स्थापित सामाजिक श्रेणियों को चुनौती दी। आधुनिक काल में गांधी और आंबेडकर भारतीय दर्शन के भीतर नैतिकता और न्याय की दो भिन्न, किंतु समान रूप से महत्त्वपूर्ण धाराएँ प्रस्तुत करते हैं।
भारतीय समाज की सबसे गहरी विडंबना यह है कि यहाँ दर्शन की परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है, किंतु मनुष्य का एक बड़ा हिस्सा आज भी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृत्तिक हाशिए पर खड़ा दिखाई देता है। एक ओर उपनिषदों में "सर्व खल्विदं ब्रह्म" की उद्घोषणा है, बुद्ध के करुणा-सूत्र हैं, भक्ति परंपरा की समता-साधना है, और आधुनिक काल में गांधी तथा आंबेडकर जैसे चिंतकों का नैतिक संघर्ष है; दूसरी ओर जात्ति, वर्ग, लिंग, श्रम और क्षेत्र के आधार पर गहराता हुआ बहिष्करण है। यह विरोधाभास केवल सामाजिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि गहराई से दार्शनिक है। इसी विरोधाभास से यह पुस्तक जन्म लेती है।
"हाशिए पर खड़ा मनुष्य" कोई अमूर्त अवधारणा नहीं है। वह वास्तविक मनुष्य है, जिसकी पहचान, श्रम, देह और आवाज़ को बार-बार गौण बना दिया गया है। वह खेत में काम करने वाला श्रमिक हो सकता है, शहरी झुग्गियों में रहने वाला प्रवासी मजदूर, आदिवासी अंचलों में विस्थापन झेलता समुदाय, जातिगत उत्पीड़न से जूझता दलित, या पितृसत्तात्मक संरचनाओं में सीमित की गई स्त्री। यह हाशिया किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है; यह सत्ता, संरचना और संस्कृति द्वारा निर्मित एक ऐसी स्थिति है, जिसमें मनुष्य को धीरे-धीरे सामाजिक दृश्यता से बाहर धकेल दिया जाता है।
इस संदर्भ में दर्शन की भूमिका केवल व्याख्यात्मक नहीं रह जाती। दर्शन यदि केवल ग्रंथों, संकल्पनाओं और ऐतिहासिक परंपराओं तक सीमित रह जाए, तो वह अपने मूल उद्देश्य से विमुख हो जाता है। दर्शन का केंद्रीय सरोकार सदैव मनुष्य, उसकी गरिमा, उसकी पीड़ा और उसके मुक्ति-प्रश्न से रहा है। इसलिए यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि क्या भारतीय दर्शन आज के सामाजिक यथार्थ में हाशिए पर खड़े मनुष्य के पक्ष में कोई नैतिक हस्तक्षेप कर सकता है? क्या वह केवल अतीत की बौद्धिक विरासत है, या वर्तमान के लिए भी एक जीवित नैतिक संसाधन ?
यह पुस्तक इसी प्रश्न को अपना केंद्रीय विंदु बनाती है। इसका उद्देश्य भारतीय दर्शन को एक ऐसे आलोचनात्मक और नैतिक ढाँचे के रूप में पुनः पढ़ना है, जो समकालीन सामाजिक अन्याय को समझने और चुनौती देने की क्षमता रखता हो। यहाँ भारतीय दर्शन को न तो आदर्शवादी रोमांटिसिज्म में प्रस्तुत किया गया है, और न ही उसे पूरी तरह अस्वीकार किया गया है। इसके बजाय, इसे एक जटिल परंपरा के रूप में देखा गया है, जिसमें मुक्ति और बहिष्करण, करुणा और अनुशासन, समता और असमानता, सभी तत्व एक साथ उपस्थित हैं।
हाशिए की अवधारणा स्वयं में एक आधुनिक सामाजिक संकल्पना प्रतीत होती है, किंतु इसके बीज भारतीय सामाजिक संरचना में बहुत पुराने हैं। वर्ण-व्यवस्था, श्रम का नैतिक अवमूल्यन, शुद्धता अशुद्धता की धारणाएँ और स्त्री की सामाजिक स्थिति जैसे प्रश्न प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में मौजूद रहे हैं। दर्शन इन संरचनाओं से अछूता नहीं रहा। कई बार उसने इन्हें वैधता दी, और कई बार इन्हें चुनौती भी दी। यही द्वंद्व इस पुस्तक का विश्लेषणात्मक आधार है।
उपनिषदों में आत्मा की सार्वभौमिकता की बात एक गहन मानवीय दृष्टि प्रस्तुत करती है, परंतु यह दृष्टि सामाजिक जीवन में समान रूप से लागू नहीं हो पाती। स्मृति परंपरा धर्म को सामाजिक कर्तव्यों से जोड़ती है, किंतु वही धर्म कई बार असमानताओं को स्थिर करने का माध्यम भी बन जाता है। बुद्ध का दर्शन इस संदर्भ में एक नैतिक विद्रोह के रूप में सामने आता है, जो दुःख को सार्वभौमिक मानवीय अनुभव मानकर करुणा और समता की नींव रखता है। भक्ति आंदोलन सामाजिक हाशिए से उठी वह दार्शनिक आवाज़ है, जिसने ईश्वर के नाम पर स्थापित सामाजिक श्रेणियों को चुनौती दी। आधुनिक काल में गांधी और आंबेडकर भारतीय दर्शन के भीतर नैतिकता और न्याय की दो भिन्न, किंतु समान रूप से महत्त्वपूर्ण धाराएँ प्रस्तुत करते हैं।