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Kuch Lamhe Bikhre Bikhre Se कुछ लम्हें बिखरे-बिखरे से
Kuch Lamhe Bikhre Bikhre Se कुछ लम्हें बिखरे-बिखरे से

Kuch Lamhe Bikhre Bikhre Se कुछ लम्हें बिखरे-बिखरे से

By: ANURADHA PRAKASHAN (??????? ??????? ?????? )
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Single Issue

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About this issue

मैं कोई बड़ी कवियत्री तो नहीं हूं जो कविताएँ लिख सकूं। आपके समक्ष जो कविताएँ हैं वो बस मेरे उन लम्हों को दिए गए शब्द हैं जिन लम्हों में मैंने स्वयं को बहुत अकेला पाया। जब मैं किसी से भी अपने मन की बात नहीं कह पाती थी उस समय और अब तक जो भी मैं महसूस करती हूँ वो सब मेरी आँखों से आँसू बनकर गिरता है और जिन्हें मेरी कलम शब्दों का रूप देकर पन्नों पर बिखेर देती है। यहीं हैं मेरे जीवन के कुछ लम्हें बिखरे-बिखरे से। जिन्हें काव्य संग्रह के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयत्न किया है।
आशा करती हूँ कि मेरे मन की भावनाएँ आपके मन को अवश्य ही छुएंगीं और यदि छुएं तो मुझे अवगत अवश्य ही कराइएगा।

About Kuch Lamhe Bikhre Bikhre Se कुछ लम्हें बिखरे-बिखरे से

मैं कोई बड़ी कवियत्री तो नहीं हूं जो कविताएँ लिख सकूं। आपके समक्ष जो कविताएँ हैं वो बस मेरे उन लम्हों को दिए गए शब्द हैं जिन लम्हों में मैंने स्वयं को बहुत अकेला पाया। जब मैं किसी से भी अपने मन की बात नहीं कह पाती थी उस समय और अब तक जो भी मैं महसूस करती हूँ वो सब मेरी आँखों से आँसू बनकर गिरता है और जिन्हें मेरी कलम शब्दों का रूप देकर पन्नों पर बिखेर देती है। यहीं हैं मेरे जीवन के कुछ लम्हें बिखरे-बिखरे से। जिन्हें काव्य संग्रह के माध्यम से आप तक पहुंचाने का प्रयत्न किया है।
आशा करती हूँ कि मेरे मन की भावनाएँ आपके मन को अवश्य ही छुएंगीं और यदि छुएं तो मुझे अवगत अवश्य ही कराइएगा।