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Lahar ke Geet : Samvedna Aur Shilp लहर के गीत : संवेदना और शिल्प
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Lahar ke Geet : Samvedna Aur Shilp लहर के गीत : संवेदना और शिल्प

By: ANURADHA PRAKASHAN (??????? ??????? ?????? )
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Single Issue

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About this issue

दो शब्द
कहने को तो दो शब्द हैं लेकिन इन दो शब्दों में भावनाओं का खजाना तथा हजारों शब्दों का समावेश है। देखा जाए तो आधुनिक हिन्दी साहित्य के छायावाद काव्यखण्ड में शास्त्रीय कवि को जब भी ढूंढ़ा जाएगा, छायावाद के प्रथम स्तम्भ जयशंकर प्रसाद जी प्रथम पंक्ति में सदैव स्थान पाएंगे। साहित्य का कला पक्ष हो या भाव पक्ष प्रसाद जी अपनी विशिष्टता तथा वैविध्यत्ता के लिए सदैव याद किए जाएगें। कवि की काव्य रचना लहर पर जब विचार करते हैं तो स्थापित कर लेते हैं कि ये सारे के सारे गीत मानव मन के अन्तर से निःसृत्त होकर प्रकृति से तदातम्य समा जाते है। सम्पूर्ण छायावदी कविता पंच त्तत्त्वों पर ही केन्द्रित है और इन्हीं पंचतत्वों से मानव शरीर का निर्माण हुआ है। जहां हम बाहरी पंच तत्वों से सामंजस्य बिठा लेंगे तभी यह हमारे भीतर के पंचतत्वों से सामंजस्य बिठा लेगा। छायावादी साहित्य के अन्त में वही सामंजस्य का स्वर गूंजायमान हैं। 'लहर' के गीतों में पंच स्वरों के साथ छठा स्वर मनुष्य है तो सातवाँ स्वर हमारी आजादी है।
प्रसाद साहित्य में गौत्तम बुद्ध नायक के रूप में हमारे सामने आते है। अपने मध्यम मार्ग द्वारा वे हृदय और मस्तिष्क के बीच सामंजस्य बिठाने का संदेश भी देते हैं। देखा जाए तो गीत प्रकृति के कण-कण में विद्यमान है, हवा का चलना, पानी बरसना, दिन रात का होना, आसमान में विविध रंगों के दर्शन के साथ मनुष्य का हृदय स्पन्दन, पलकों का उठना गिरना सासों की आवाजाही इत्यादि। ये सारे गीति तत्वों से भरे पड़े हैं। समाज में जो कुछ भी है साहित्य में उसी को अभिव्यक्ति मिली है। ये अभिव्यक्तियाँ ही साहित्य की श्रेणी में आती है। 'लहर के गीतः संवेदना और शिल्प यह मेरा एम.फिल. का लघु शोध कार्य है, जिसमें मैंने प्रसाद जी के 29 गीतों के भावपक्ष तथा कलापक्ष को जैसा समझा उसी की अभिव्यक्ति है। लम्बी कविताओं पर मैंने काम नहीं किया है। काम नहीं करने के पीछे एक कारण यह भी था कि गीत छोटे होने के कारण उनकी भावाभिव्यक्ति तक जल्द पहुंच जाती थी, किन्तु लम्बी कविताएँ मुझे खण्डकाव्य का छोटा रूप स्वरूप लगती थी, फिर अपनी क्षमता को भी नाप, तौल लेना उचित है क्योंकि पैर भी उतना ही फैलाना चाहिए जितनी अपनी चादर हो वानी की अपनी क्षमता हो। अपनी कमियों को खुलकर स्वीकारना ही मुझे उचित प्रतीत होता है।
इस संग्रह को में जितनी बार पढ़ती हूँ हर बार मेरे मानस में आनन्द की लहरें उठने लगती हैं, जो मुझे आनन्द सागर में गोते लगवाने लगती है। सहृदय की अवधारण यही साकार हो उठती है कि साहित्य को पढ़कर आनन्द की अनुभूति हो। इस आनन्द अनुमति को मैंने जितना परखा, समझा इत्यादि उसे अभिव्यक्त्ति प्रदान करने की कोशिश भर की है। कोशिश इसलिए की गूगे अपनी भावों की अभिव्यक्ति नहीं कर पाते है सिर्फ अनुभूति प्राप्त करते है। प्रसाद जैसे महान कवि के सामने मेरी बाल सरस्वती मूक हो जाती है। इस मूकता से जो स्वर स्फुटित हुआ, मेरा यह कार्य पुस्तक रूप में उसी की अभिव्यक्ति है।
'लहर' में संकलित गीत मानवीय जीवन, प्रकृत्ति और आध्यात्मिक अनुभवों की गहन सम्वेदना को अभिव्यक्त करते है। इन गीतों में जहाँ एक ओर भावनाओं की सूक्ष्मता है, वहीं दूसरी ओर शिल्प की सघनता और सौन्दर्य भी दिखाई देता है। इनके गीत व्यक्ति का अकेलापन, आशा-निराशा, प्रेम-पीड़ा करूणा के साथ ही आत्मा के भीतरी दुनिया को पकड़ते हैं, सिर्फ बहरी घटना नहीं। आत्मचिन्तन के साथ आत्मसंवाद इस संग्रह के गीतों की विशेष पहचान है।

About Lahar ke Geet : Samvedna Aur Shilp लहर के गीत : संवेदना और शिल्प

दो शब्द
कहने को तो दो शब्द हैं लेकिन इन दो शब्दों में भावनाओं का खजाना तथा हजारों शब्दों का समावेश है। देखा जाए तो आधुनिक हिन्दी साहित्य के छायावाद काव्यखण्ड में शास्त्रीय कवि को जब भी ढूंढ़ा जाएगा, छायावाद के प्रथम स्तम्भ जयशंकर प्रसाद जी प्रथम पंक्ति में सदैव स्थान पाएंगे। साहित्य का कला पक्ष हो या भाव पक्ष प्रसाद जी अपनी विशिष्टता तथा वैविध्यत्ता के लिए सदैव याद किए जाएगें। कवि की काव्य रचना लहर पर जब विचार करते हैं तो स्थापित कर लेते हैं कि ये सारे के सारे गीत मानव मन के अन्तर से निःसृत्त होकर प्रकृति से तदातम्य समा जाते है। सम्पूर्ण छायावदी कविता पंच त्तत्त्वों पर ही केन्द्रित है और इन्हीं पंचतत्वों से मानव शरीर का निर्माण हुआ है। जहां हम बाहरी पंच तत्वों से सामंजस्य बिठा लेंगे तभी यह हमारे भीतर के पंचतत्वों से सामंजस्य बिठा लेगा। छायावादी साहित्य के अन्त में वही सामंजस्य का स्वर गूंजायमान हैं। 'लहर' के गीतों में पंच स्वरों के साथ छठा स्वर मनुष्य है तो सातवाँ स्वर हमारी आजादी है।
प्रसाद साहित्य में गौत्तम बुद्ध नायक के रूप में हमारे सामने आते है। अपने मध्यम मार्ग द्वारा वे हृदय और मस्तिष्क के बीच सामंजस्य बिठाने का संदेश भी देते हैं। देखा जाए तो गीत प्रकृति के कण-कण में विद्यमान है, हवा का चलना, पानी बरसना, दिन रात का होना, आसमान में विविध रंगों के दर्शन के साथ मनुष्य का हृदय स्पन्दन, पलकों का उठना गिरना सासों की आवाजाही इत्यादि। ये सारे गीति तत्वों से भरे पड़े हैं। समाज में जो कुछ भी है साहित्य में उसी को अभिव्यक्ति मिली है। ये अभिव्यक्तियाँ ही साहित्य की श्रेणी में आती है। 'लहर के गीतः संवेदना और शिल्प यह मेरा एम.फिल. का लघु शोध कार्य है, जिसमें मैंने प्रसाद जी के 29 गीतों के भावपक्ष तथा कलापक्ष को जैसा समझा उसी की अभिव्यक्ति है। लम्बी कविताओं पर मैंने काम नहीं किया है। काम नहीं करने के पीछे एक कारण यह भी था कि गीत छोटे होने के कारण उनकी भावाभिव्यक्ति तक जल्द पहुंच जाती थी, किन्तु लम्बी कविताएँ मुझे खण्डकाव्य का छोटा रूप स्वरूप लगती थी, फिर अपनी क्षमता को भी नाप, तौल लेना उचित है क्योंकि पैर भी उतना ही फैलाना चाहिए जितनी अपनी चादर हो वानी की अपनी क्षमता हो। अपनी कमियों को खुलकर स्वीकारना ही मुझे उचित प्रतीत होता है।
इस संग्रह को में जितनी बार पढ़ती हूँ हर बार मेरे मानस में आनन्द की लहरें उठने लगती हैं, जो मुझे आनन्द सागर में गोते लगवाने लगती है। सहृदय की अवधारण यही साकार हो उठती है कि साहित्य को पढ़कर आनन्द की अनुभूति हो। इस आनन्द अनुमति को मैंने जितना परखा, समझा इत्यादि उसे अभिव्यक्त्ति प्रदान करने की कोशिश भर की है। कोशिश इसलिए की गूगे अपनी भावों की अभिव्यक्ति नहीं कर पाते है सिर्फ अनुभूति प्राप्त करते है। प्रसाद जैसे महान कवि के सामने मेरी बाल सरस्वती मूक हो जाती है। इस मूकता से जो स्वर स्फुटित हुआ, मेरा यह कार्य पुस्तक रूप में उसी की अभिव्यक्ति है।
'लहर' में संकलित गीत मानवीय जीवन, प्रकृत्ति और आध्यात्मिक अनुभवों की गहन सम्वेदना को अभिव्यक्त करते है। इन गीतों में जहाँ एक ओर भावनाओं की सूक्ष्मता है, वहीं दूसरी ओर शिल्प की सघनता और सौन्दर्य भी दिखाई देता है। इनके गीत व्यक्ति का अकेलापन, आशा-निराशा, प्रेम-पीड़ा करूणा के साथ ही आत्मा के भीतरी दुनिया को पकड़ते हैं, सिर्फ बहरी घटना नहीं। आत्मचिन्तन के साथ आत्मसंवाद इस संग्रह के गीतों की विशेष पहचान है।