मुझे भी कुछ कहना है
भारतभूमि आदिकाल से ही अध्यात्म, दर्शन और संस्कृति की पवित्र भूमि रही है। यहाँ के ऋषि-मुनियों ने मानव जीवन के परम रहस्य की खोज की और जो सत्य अनुभव किया, वही शास्त्रों में अभिव्यक्त हुआ। इसी शाश्वत परंपरा को "सनातन धर्म" कहा जाता है। सनातन का अर्थ है जो कभी न समाप्त हो, जो नित्य, अविनाशी और अनादि हो। धर्म का तात्पर्य केवल पूजा-विधि या कर्मकांड तक सीमित नहीं है, अपितु यह जीवन की संपूर्ण व्यवस्था है, जो मनुष्य को आत्मानुशासन, सदाचार और परोपकार की ओर ले जाती है।
सनातन धर्म केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं है। यह हमारे जीवन के प्रत्येक अंग में व्याप्त है। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, दया, क्षमा, शौच, संतोष और तपस्या जैसे मूल्य मनुष्य को पवित्र और परिष्कृत बनाते हैं। यही कारण है कि इसे किसी विशेष पंथ या जाति का धर्म न मानकर सार्वभौम घर्म कहा जाता है। इसमें करुणा केवल मनुष्य तक नहीं, बल्कि समस्त प्राणिमात्र तक विस्तृत है। वृक्ष, जल, वायु, पशु-पक्षी, पर्वत और नदी सबका सम्मान करना इसी धर्म का अंग है।
सनातन धर्म केवल भारत का नहीं, अपितु संपूर्ण मानवता का जीवनदर्शन है। यह न तो किसी एक जाति का है, न किसी एक काल का। यह अनादि है और अनंत है। इसकी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही सार्थक हैं, प्रासंगिक हैं जितनी सहस्रों वर्ष पूर्व थीं। यह हमें सिखाता है कि आत्मा अमर है, सत्य अनन्त है और करुणा ही वास्तविक बल है। जो व्यक्ति इन मूल्यों को अपनाता है, उसका जीवन पवित्र और उदात्त बन जाता है।
मुझे भी कुछ कहना है
भारतभूमि आदिकाल से ही अध्यात्म, दर्शन और संस्कृति की पवित्र भूमि रही है। यहाँ के ऋषि-मुनियों ने मानव जीवन के परम रहस्य की खोज की और जो सत्य अनुभव किया, वही शास्त्रों में अभिव्यक्त हुआ। इसी शाश्वत परंपरा को "सनातन धर्म" कहा जाता है। सनातन का अर्थ है जो कभी न समाप्त हो, जो नित्य, अविनाशी और अनादि हो। धर्म का तात्पर्य केवल पूजा-विधि या कर्मकांड तक सीमित नहीं है, अपितु यह जीवन की संपूर्ण व्यवस्था है, जो मनुष्य को आत्मानुशासन, सदाचार और परोपकार की ओर ले जाती है।
सनातन धर्म केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं है। यह हमारे जीवन के प्रत्येक अंग में व्याप्त है। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, दया, क्षमा, शौच, संतोष और तपस्या जैसे मूल्य मनुष्य को पवित्र और परिष्कृत बनाते हैं। यही कारण है कि इसे किसी विशेष पंथ या जाति का धर्म न मानकर सार्वभौम घर्म कहा जाता है। इसमें करुणा केवल मनुष्य तक नहीं, बल्कि समस्त प्राणिमात्र तक विस्तृत है। वृक्ष, जल, वायु, पशु-पक्षी, पर्वत और नदी सबका सम्मान करना इसी धर्म का अंग है।
सनातन धर्म केवल भारत का नहीं, अपितु संपूर्ण मानवता का जीवनदर्शन है। यह न तो किसी एक जाति का है, न किसी एक काल का। यह अनादि है और अनंत है। इसकी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही सार्थक हैं, प्रासंगिक हैं जितनी सहस्रों वर्ष पूर्व थीं। यह हमें सिखाता है कि आत्मा अमर है, सत्य अनन्त है और करुणा ही वास्तविक बल है। जो व्यक्ति इन मूल्यों को अपनाता है, उसका जीवन पवित्र और उदात्त बन जाता है।