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Chambal Kavya Dhara चंबल काव्य धारा
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Chambal Kavya Dhara चंबल काव्य धारा

By: ANURADHA PRAKASHAN (??????? ??????? ?????? )
200.00

Single Issue

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About this issue

हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा के सशक्त हस्ताक्षर श्री उमाकांत भरद्वाज (सविता) "लक्ष्य" जी, की काव्य कृति 'चंबल काव्य धारा' हिंदी साहित्य जगत के लिए महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
इस संग्रह की विशेषता छंद-विविधता है। मात्रिक और वर्णिक दोनों ही छंदों पर आपकी पकड़ सिद्ध करती है, कि आप छंदशास्त्र के गंभीर अध्येता और कुशल साधक हैं। विषय-वस्तु की दृष्टि से भी कृति अत्यंत गहन और व्यापक है। इसमें भक्तिभाव पूर्ण रचनाएँ, राष्ट्रप्रेम, प्रकृति के प्रति अनुराग, सामाजिक चेतना व महापुरुषों का यशोगान आदि का सुन्दर समन्वय है। कवि के काव्य-संस्कारों की जड़ें उनके सनातनी परिवार एवं सांस्कृतिक परिवेश में निहित हैं। आपने लिखा है, कि महाकवि शिशुपाल सिंह 'शिशु' के सान्निध्य और प्रेरणा ने आपके रचना-संसार को दिशा और गहराई प्रदान की है।
भाषा की दृष्टि से "लक्ष्य" जी की रचनाएँ सरल, सरस और भावानुकूल हैं। उनकी भाषा में न तो कृत्रिम जटिलता है और न ही अनावश्यक अलंकरण; बल्कि सहजता और भाव-प्रवाह ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है। यह कृति साहित्य प्रेमियों के लिए पठनीय तथा नव युवा कवियों के लिए प्रेरणास्रोत सिद्ध होगी।
काव्य संग्रह का अंतिम गीत 'बहू बुढ़ापे की लाठी है' में कवि ने बहू को 'धान समान रोप दी जाती' जैसे सशक्त प्रतीक के माध्यम से व्यक्त किया है, जो भारतीय संस्कृति की गहराई को स्पर्श करता है। यह गीत न केवल संग्रह का समापन करता है, बल्कि पूरे काव्य संग्रह की भावधारा को एक सार्थक संदेश के साथ पूर्णता भी प्रदान करता है। अंततः कहा जा सकता है, कि "लक्ष्य" जी की यह काव्यकृति हिंदी साहित्य की धरोहर को समृद्ध करने वाली सार्थक और प्रशंसनीय प्रस्तुति है। कृति की सफलता हेतु श्री 'लक्ष्य' जी को हार्दिक बधाई व अनन्त शुभकामनाएँ।
-डॉ. ज्योत्स्ना सिंह राजावत,
सहायक प्राध्यापक-भाषा अध्ययन केन्द्र, जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर (म.प्र.)

About Chambal Kavya Dhara चंबल काव्य धारा

हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा के सशक्त हस्ताक्षर श्री उमाकांत भरद्वाज (सविता) "लक्ष्य" जी, की काव्य कृति 'चंबल काव्य धारा' हिंदी साहित्य जगत के लिए महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
इस संग्रह की विशेषता छंद-विविधता है। मात्रिक और वर्णिक दोनों ही छंदों पर आपकी पकड़ सिद्ध करती है, कि आप छंदशास्त्र के गंभीर अध्येता और कुशल साधक हैं। विषय-वस्तु की दृष्टि से भी कृति अत्यंत गहन और व्यापक है। इसमें भक्तिभाव पूर्ण रचनाएँ, राष्ट्रप्रेम, प्रकृति के प्रति अनुराग, सामाजिक चेतना व महापुरुषों का यशोगान आदि का सुन्दर समन्वय है। कवि के काव्य-संस्कारों की जड़ें उनके सनातनी परिवार एवं सांस्कृतिक परिवेश में निहित हैं। आपने लिखा है, कि महाकवि शिशुपाल सिंह 'शिशु' के सान्निध्य और प्रेरणा ने आपके रचना-संसार को दिशा और गहराई प्रदान की है।
भाषा की दृष्टि से "लक्ष्य" जी की रचनाएँ सरल, सरस और भावानुकूल हैं। उनकी भाषा में न तो कृत्रिम जटिलता है और न ही अनावश्यक अलंकरण; बल्कि सहजता और भाव-प्रवाह ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है। यह कृति साहित्य प्रेमियों के लिए पठनीय तथा नव युवा कवियों के लिए प्रेरणास्रोत सिद्ध होगी।
काव्य संग्रह का अंतिम गीत 'बहू बुढ़ापे की लाठी है' में कवि ने बहू को 'धान समान रोप दी जाती' जैसे सशक्त प्रतीक के माध्यम से व्यक्त किया है, जो भारतीय संस्कृति की गहराई को स्पर्श करता है। यह गीत न केवल संग्रह का समापन करता है, बल्कि पूरे काव्य संग्रह की भावधारा को एक सार्थक संदेश के साथ पूर्णता भी प्रदान करता है। अंततः कहा जा सकता है, कि "लक्ष्य" जी की यह काव्यकृति हिंदी साहित्य की धरोहर को समृद्ध करने वाली सार्थक और प्रशंसनीय प्रस्तुति है। कृति की सफलता हेतु श्री 'लक्ष्य' जी को हार्दिक बधाई व अनन्त शुभकामनाएँ।
-डॉ. ज्योत्स्ना सिंह राजावत,
सहायक प्राध्यापक-भाषा अध्ययन केन्द्र, जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर (म.प्र.)