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Divya Sarovar दिव्य सरोवर
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Divya Sarovar दिव्य सरोवर

By: ANURADHA PRAKASHAN (??????? ??????? ?????? )
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Single Issue

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About this issue

आज के युग में इंसान तेजी से बदलती अपनी जीवन शैली चकाचौंध एवं पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में अपने पुराने संस्कार भूलता जा रहा है। इंटरनेट व सोशल मीडिया के कारण पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण बढ़ रहा है। आधुनिक दिखने की चाह में युवा वर्ग अपनी पुरानी संस्कृति एवं परम्पराओं को पुराना समझने लगे हैं। आज के समय में संयुक्त परिवार के अभाव में बच्चों को अपने दादा-दादी का सानिध्य नहीं मिल पाता जिसके कारण दादा-दादी के द्वारा कहानियों के माध्यम से मिलने वाले नैतिक मूल्य नहीं मिल पाते। दिखावे और अहंकार के चलते लोग संयुक्त परिवार के अनुशासन और पारंपरिक मान्यताओं से दूर भागते हैं।
आज की शिक्षा भी केवल किताबी ज्ञान और करियर केन्द्रित रह गयी है जिसमें नैतिक शिक्षा और संस्कारों का अभाव होता है। अतैव इस युग में आवश्यक है कि हम अपने बच्चों में अच्छे संस्कार डालें। इसका सबसे अच्छा तरीका है कि हम अपने बच्चों को उपदेश देने के बजाए अपने आचरण में उन मूल्यों को उतारें क्योंकि बच्चे बड़ों का अनुकरण करते है। बच्चों को सिखाएं असफलता से डरना नहीं अपितु उनसे सीखना चाहिए। अपने बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय व्यतीत करें, उनकी बातों को धैर्यपूर्वक सुने जिससे वे किसी भी परेशानी में आपसे खुलकर बात कर सके। धैर्य की कमी के कारण आजकल लोग असफल होने पर आत्महत्या जैसे दुःखद एवं विनाशकारी कदम उठा रहे है जबकि हर समस्या का हल बातचीत व सही इलाज से सम्भव हैं।
अच्छे संस्कारों की सीख जीवन भर चलने वाली पूंजी है जो आजीवन व्यक्ति के काम आती है। विद्यार्थी जीवन में संस्कारों का महत्व "नींव के पत्थर" जैसा है। शिक्षा जहाँ हमें आजीविका कमाना सिखाती है वहीं संस्कार हमें जीवन जीने की कला, सही गलत की पहचान और उत्तम चरित्र प्रदान करते हैं। संस्कारित व्यक्ति जीवन में हमेशा अनुशासित विनम्र और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहते हैं।

About Divya Sarovar दिव्य सरोवर

आज के युग में इंसान तेजी से बदलती अपनी जीवन शैली चकाचौंध एवं पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में अपने पुराने संस्कार भूलता जा रहा है। इंटरनेट व सोशल मीडिया के कारण पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण बढ़ रहा है। आधुनिक दिखने की चाह में युवा वर्ग अपनी पुरानी संस्कृति एवं परम्पराओं को पुराना समझने लगे हैं। आज के समय में संयुक्त परिवार के अभाव में बच्चों को अपने दादा-दादी का सानिध्य नहीं मिल पाता जिसके कारण दादा-दादी के द्वारा कहानियों के माध्यम से मिलने वाले नैतिक मूल्य नहीं मिल पाते। दिखावे और अहंकार के चलते लोग संयुक्त परिवार के अनुशासन और पारंपरिक मान्यताओं से दूर भागते हैं।
आज की शिक्षा भी केवल किताबी ज्ञान और करियर केन्द्रित रह गयी है जिसमें नैतिक शिक्षा और संस्कारों का अभाव होता है। अतैव इस युग में आवश्यक है कि हम अपने बच्चों में अच्छे संस्कार डालें। इसका सबसे अच्छा तरीका है कि हम अपने बच्चों को उपदेश देने के बजाए अपने आचरण में उन मूल्यों को उतारें क्योंकि बच्चे बड़ों का अनुकरण करते है। बच्चों को सिखाएं असफलता से डरना नहीं अपितु उनसे सीखना चाहिए। अपने बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय व्यतीत करें, उनकी बातों को धैर्यपूर्वक सुने जिससे वे किसी भी परेशानी में आपसे खुलकर बात कर सके। धैर्य की कमी के कारण आजकल लोग असफल होने पर आत्महत्या जैसे दुःखद एवं विनाशकारी कदम उठा रहे है जबकि हर समस्या का हल बातचीत व सही इलाज से सम्भव हैं।
अच्छे संस्कारों की सीख जीवन भर चलने वाली पूंजी है जो आजीवन व्यक्ति के काम आती है। विद्यार्थी जीवन में संस्कारों का महत्व "नींव के पत्थर" जैसा है। शिक्षा जहाँ हमें आजीविका कमाना सिखाती है वहीं संस्कार हमें जीवन जीने की कला, सही गलत की पहचान और उत्तम चरित्र प्रदान करते हैं। संस्कारित व्यक्ति जीवन में हमेशा अनुशासित विनम्र और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहते हैं।