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MERI 52 KAVITAYEN मेरी 52 कविताएँ
MERI 52 KAVITAYEN मेरी 52 कविताएँ

MERI 52 KAVITAYEN मेरी 52 कविताएँ

By: ANURADHA PRAKASHAN (??????? ??????? ?????? )
125.00

Single Issue

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About this issue

प्रस्तावना
मैंने पहले भी कहा है कि कविताओं का अंश तो सबमें होता है पर उसकी अनुभूति करनी होती है और यही अनुभूति में हमेशा अपने आसपास की चीजों को देखकर करता रहा हूं। मेरी यह किताब किसी एक विषय पर नहीं लिखी गई है बल्कि इस किताब को लिखने की प्रेरणा, किताब के विषय और इस किताब के चरित्र मुझे अपने आसपास के लोगों, अपने आसपास की घटनाओं और इस समाज में हो रही चीजों से मिली। कुल मिलाकर मेरी यह किताब इस समाज का एक आईना है, जो मेरी नज़रों से देखा गया है। आईना देखते देखते कब श्रृंगार पूरा हो गया यह पता ही नहीं लगा और यह श्रृंगार इन 52 कविताओं के रूप में निकल कर आया। इस श्रृंगार को आप भी निहारें और बताएँ कि श्रृंगार अधूरा है या कुछ सुंदरता भी है, इस श्रृंगार में। मनुष्य का श्रृंगार तो कभी पूर्ण नहीं हो सकता परंतु रुचिकर लग सकता है। आप भी इस सुंदरता में रुचि लीजिए।
किताब की शुरुआत मैंने उन लोगों को श्रद्धांजलि देकर की है जो कि कोरोना-काल में असमय ही काल के गाल में समा गए। इस शुरुआत के बाद मुझे इस समाज के आईने में कभी काम करता हुआ श्रमिक दिखा, कभी बेटियों की पीड़ा दिखाई दी, कभी आतंकवाद, कभी सुलगता कश्मीर और कभी आपस में लड़ते इंसान दिखाई दिए। कभी मजहब के नाम पर तो कभी भाषा, तो कभी लालच में गिरा इंसान भी दिखाई दिया। भारत की सांस्कृतिक एकता और आधुनिक भारत का मंगलयान, हमारे वीर सैनिकों की ललकार इन विषयों पर भी इस पुस्तक में मैंने लिखने का प्रयास किया है। कुछ और अभिव्यक्तियाँ जैसे ज़िंदगी की जद्दोजहद, वक्त, उम्र एवं हिचकियों का भी ज़िक्र कई कविताओं में आपको मिलेगा। बस आप पढ़ना शुरू करिए और मेरी नजरों से समाज का आईना देखते रहिए।
डॉ. अरविंद सहाय (अविरल)
लेखक एवं वैज्ञानिक
अंतरिक्ष उपयोग केंद्र
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO)
अहमदाबाद, गुजरात

About MERI 52 KAVITAYEN मेरी 52 कविताएँ

प्रस्तावना
मैंने पहले भी कहा है कि कविताओं का अंश तो सबमें होता है पर उसकी अनुभूति करनी होती है और यही अनुभूति में हमेशा अपने आसपास की चीजों को देखकर करता रहा हूं। मेरी यह किताब किसी एक विषय पर नहीं लिखी गई है बल्कि इस किताब को लिखने की प्रेरणा, किताब के विषय और इस किताब के चरित्र मुझे अपने आसपास के लोगों, अपने आसपास की घटनाओं और इस समाज में हो रही चीजों से मिली। कुल मिलाकर मेरी यह किताब इस समाज का एक आईना है, जो मेरी नज़रों से देखा गया है। आईना देखते देखते कब श्रृंगार पूरा हो गया यह पता ही नहीं लगा और यह श्रृंगार इन 52 कविताओं के रूप में निकल कर आया। इस श्रृंगार को आप भी निहारें और बताएँ कि श्रृंगार अधूरा है या कुछ सुंदरता भी है, इस श्रृंगार में। मनुष्य का श्रृंगार तो कभी पूर्ण नहीं हो सकता परंतु रुचिकर लग सकता है। आप भी इस सुंदरता में रुचि लीजिए।
किताब की शुरुआत मैंने उन लोगों को श्रद्धांजलि देकर की है जो कि कोरोना-काल में असमय ही काल के गाल में समा गए। इस शुरुआत के बाद मुझे इस समाज के आईने में कभी काम करता हुआ श्रमिक दिखा, कभी बेटियों की पीड़ा दिखाई दी, कभी आतंकवाद, कभी सुलगता कश्मीर और कभी आपस में लड़ते इंसान दिखाई दिए। कभी मजहब के नाम पर तो कभी भाषा, तो कभी लालच में गिरा इंसान भी दिखाई दिया। भारत की सांस्कृतिक एकता और आधुनिक भारत का मंगलयान, हमारे वीर सैनिकों की ललकार इन विषयों पर भी इस पुस्तक में मैंने लिखने का प्रयास किया है। कुछ और अभिव्यक्तियाँ जैसे ज़िंदगी की जद्दोजहद, वक्त, उम्र एवं हिचकियों का भी ज़िक्र कई कविताओं में आपको मिलेगा। बस आप पढ़ना शुरू करिए और मेरी नजरों से समाज का आईना देखते रहिए।
डॉ. अरविंद सहाय (अविरल)
लेखक एवं वैज्ञानिक
अंतरिक्ष उपयोग केंद्र
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO)
अहमदाबाद, गुजरात