यह पुस्तक किसी एक घटना, नीति या विवाद की प्रतिक्रिया में नहीं लिखी गई है। यह उस व्यापक नैतिक वेचीनी से जन्म लेती है, जो आज के भारत में लगभग हर स्तर पर महसूस की जा सकती है राजनीति में, विकास की भाषा में, सार्वजनिक विमर्श में, और व्यक्ति के निजी जीवन में भी। यह बेचैनी केवल मूल्यों के पतन की शिकायत नहीं है, बल्कि उस गहरे द्वंद्व का संकेत है, जहाँ सही और गलत की रेखाएँ धुंधली होती जा रही हैं, और निर्णय लेना पहले से अधिक जटिल होता जा रहा है। नया भारत तेज़ी से बदल रहा है। आर्थिक आकांक्षाएँ बढ़ी हैं, तकनीक ने जीवन को नया रूप दिया है, और वैश्विक मंच पर भारत की उपस्थिति सशक्त हुई है। लेकिन इसी गति के साथ नैतिक प्रश्न भी तीखे हुए हैं। क्या विकास केवल आँकड़ों से मापा जा सकता है। क्या लोकतंत्र केवल प्रक्रियाओं से जीवित रहता है। क्या पहचान की राजनीति न्याय की ओर ले जाती है या नए बहिष्करण रचती है। और सबसे निजी स्तर पर, क्या आधुनिक जीवन सचमुच अधिक सुखी और अर्थपूर्ण बन पाया है। यह पुस्तक इन्हीं प्रश्नों के बीच खड़ी होकर लिखी गई है। इसका उद्देश्य नए भारत की प्रशंसा करना या उसका निषेध करना नहीं है। यह अध्ययन न तो नैतिक उपदेश देना चाहता है और न ही सरल समाधान प्रस्तुत करता है। इसके विपरीत, यह उन नैतिक द्वंद्वों को समझने का प्रयास है, जिनके भीतर आज का भारत स्वयं को गढ़ रहा है। यह पुस्तक यह मानकर चलती है कि द्वंद्व अपने आप में विफलता नहीं होते। वे उस बिंदु को दशति हैं, जहाँ समाज को रुककर सोचना पड़ता है। इस पुस्तक की वैचारिक पृष्ठभूमि भारतीय नैतिक परंपरा और समकालीन दार्शनिक चिंतन दोनों से संवाद करती है। धर्म, कर्म, करुणा और संतुलन जैसी अवधारणाओं को आधुनिक लोकतंत्र, अधिकार, तकनीक और बाज़ार की भाषा के साथ आमने-सामने रखा गया है। उद्देश्य किसी एक को श्रेष्ठ सिद्ध करना नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि आज के नैतिक प्रश्न न तो केवल परंपरा से हल हो सकते हैं और न ही आधुनिकता को बिना आलोचना अपनाकर ।
यह पुस्तक किसी एक घटना, नीति या विवाद की प्रतिक्रिया में नहीं लिखी गई है। यह उस व्यापक नैतिक वेचीनी से जन्म लेती है, जो आज के भारत में लगभग हर स्तर पर महसूस की जा सकती है राजनीति में, विकास की भाषा में, सार्वजनिक विमर्श में, और व्यक्ति के निजी जीवन में भी। यह बेचैनी केवल मूल्यों के पतन की शिकायत नहीं है, बल्कि उस गहरे द्वंद्व का संकेत है, जहाँ सही और गलत की रेखाएँ धुंधली होती जा रही हैं, और निर्णय लेना पहले से अधिक जटिल होता जा रहा है। नया भारत तेज़ी से बदल रहा है। आर्थिक आकांक्षाएँ बढ़ी हैं, तकनीक ने जीवन को नया रूप दिया है, और वैश्विक मंच पर भारत की उपस्थिति सशक्त हुई है। लेकिन इसी गति के साथ नैतिक प्रश्न भी तीखे हुए हैं। क्या विकास केवल आँकड़ों से मापा जा सकता है। क्या लोकतंत्र केवल प्रक्रियाओं से जीवित रहता है। क्या पहचान की राजनीति न्याय की ओर ले जाती है या नए बहिष्करण रचती है। और सबसे निजी स्तर पर, क्या आधुनिक जीवन सचमुच अधिक सुखी और अर्थपूर्ण बन पाया है। यह पुस्तक इन्हीं प्रश्नों के बीच खड़ी होकर लिखी गई है। इसका उद्देश्य नए भारत की प्रशंसा करना या उसका निषेध करना नहीं है। यह अध्ययन न तो नैतिक उपदेश देना चाहता है और न ही सरल समाधान प्रस्तुत करता है। इसके विपरीत, यह उन नैतिक द्वंद्वों को समझने का प्रयास है, जिनके भीतर आज का भारत स्वयं को गढ़ रहा है। यह पुस्तक यह मानकर चलती है कि द्वंद्व अपने आप में विफलता नहीं होते। वे उस बिंदु को दशति हैं, जहाँ समाज को रुककर सोचना पड़ता है। इस पुस्तक की वैचारिक पृष्ठभूमि भारतीय नैतिक परंपरा और समकालीन दार्शनिक चिंतन दोनों से संवाद करती है। धर्म, कर्म, करुणा और संतुलन जैसी अवधारणाओं को आधुनिक लोकतंत्र, अधिकार, तकनीक और बाज़ार की भाषा के साथ आमने-सामने रखा गया है। उद्देश्य किसी एक को श्रेष्ठ सिद्ध करना नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि आज के नैतिक प्रश्न न तो केवल परंपरा से हल हो सकते हैं और न ही आधुनिकता को बिना आलोचना अपनाकर ।