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Phir se Ajnabi फिर से अजनबी
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Phir se Ajnabi फिर से अजनबी

By: ANURADHA PRAKASHAN (??????? ??????? ?????? )
125.00

Single Issue

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About this issue

(प्रस्तावना)

कुछ कहानियाँ कोरे पन्नों पर महज़ शब्दों को जोड़कर सोची और बुनी जाती हैं, और कुछ कहानियाँ ज़िंदगी के अनकहे अनुभवों के ज़हन में ठहर जाने से जन्म लेती हैं। 'फिर से अजनबी' प्रेम, मर्यादा और वफादारी के उन्हीं गहरे जज़्बातों का एक काल्पनिक ताना-बाना है, जिसे मैंने शब्दों के रूप में पिरोने का प्रयास किया है। यह दास्तान है साल 2001 की कॉलेज की उस तीसरी बेंच की, और एक पवित्र रिश्ते की शुरुआत की । लेकिन वक्त के क्रूर थपेड़ों और सामाजिक बेबसी के बीच गूँजी वह एक आखिरी चीख... जिसने एक हंसते-खेलते रिश्ते को तड़प और खामोशी के अंतहीन ग्लेशियर में बदल दिया। पूरे पच्चीस साल का एक लंबा सन्नाटा... एक ऐसा इंतज़ार जो वक़्त के साथ और गहरा होता चला गया ।

लेकिन साल 2026 में वक्त का पहिया एक बार फिर घूमता है। लज़ीज़ अफेयर (Lazeez Affaire) की उसी ऐतिहासिक मेज़ पर जब पच्चीस साल बाद वही दो चिर-परिचित चेहरे फिर आमने-सामने बैठते हैं, तो बिखरे हुए अतीत का सारा समंदर आँखों में तैर आता है। यह उपन्यास सिर्फ एक बिखरे हुए अतीत की दास्तान नहीं है, बल्कि यह कहानी है प्रेम की उस पराकाष्ठा की, जहाँ किसी को पा लेना ही मोहब्बत की सफलता नहीं होती। जब ज़िंदगी आपको एक सुरक्षित और मर्यादित किनारा देती है, तो अपने अतीत को गरिमा के साथ विदा करना ही स्वाभिमान की असली पहचान बन जाता है।

एक लेखक के तौर पर, मैं दिल से शुक्रगुज़ार हूँ अपने अज़ीज़ यार 'कुलदीप' का, जो हर मुश्किल मोड़ पर मेरा मजबूत कंधा बना रहा, और अपनी जीवनसंगिनी 'सुमन' का, जिसके अगाध विश्वास, परिपक्वता और निश्छल साथ ने मेरी ज़िंदगी को एक बेहद खूबसूरत और सुरक्षित किनारा दिया।

आशा करता हूँ कि जब आप समर और अंजली के इस सफ़र से गुज़रते हुए इसके आखिरी ताले तक पहुँचेंगे, तो आपका दिल भी प्रेम, मर्यादा और स्वाभिमान के इस पवित्र रिश्ते को गहराई से महसूस कर पाएगा।

सुरेन्द्र कुमार 'साहिल'

फिर से अजनबी 7

About Phir se Ajnabi फिर से अजनबी

(प्रस्तावना)

कुछ कहानियाँ कोरे पन्नों पर महज़ शब्दों को जोड़कर सोची और बुनी जाती हैं, और कुछ कहानियाँ ज़िंदगी के अनकहे अनुभवों के ज़हन में ठहर जाने से जन्म लेती हैं। 'फिर से अजनबी' प्रेम, मर्यादा और वफादारी के उन्हीं गहरे जज़्बातों का एक काल्पनिक ताना-बाना है, जिसे मैंने शब्दों के रूप में पिरोने का प्रयास किया है। यह दास्तान है साल 2001 की कॉलेज की उस तीसरी बेंच की, और एक पवित्र रिश्ते की शुरुआत की । लेकिन वक्त के क्रूर थपेड़ों और सामाजिक बेबसी के बीच गूँजी वह एक आखिरी चीख... जिसने एक हंसते-खेलते रिश्ते को तड़प और खामोशी के अंतहीन ग्लेशियर में बदल दिया। पूरे पच्चीस साल का एक लंबा सन्नाटा... एक ऐसा इंतज़ार जो वक़्त के साथ और गहरा होता चला गया ।

लेकिन साल 2026 में वक्त का पहिया एक बार फिर घूमता है। लज़ीज़ अफेयर (Lazeez Affaire) की उसी ऐतिहासिक मेज़ पर जब पच्चीस साल बाद वही दो चिर-परिचित चेहरे फिर आमने-सामने बैठते हैं, तो बिखरे हुए अतीत का सारा समंदर आँखों में तैर आता है। यह उपन्यास सिर्फ एक बिखरे हुए अतीत की दास्तान नहीं है, बल्कि यह कहानी है प्रेम की उस पराकाष्ठा की, जहाँ किसी को पा लेना ही मोहब्बत की सफलता नहीं होती। जब ज़िंदगी आपको एक सुरक्षित और मर्यादित किनारा देती है, तो अपने अतीत को गरिमा के साथ विदा करना ही स्वाभिमान की असली पहचान बन जाता है।

एक लेखक के तौर पर, मैं दिल से शुक्रगुज़ार हूँ अपने अज़ीज़ यार 'कुलदीप' का, जो हर मुश्किल मोड़ पर मेरा मजबूत कंधा बना रहा, और अपनी जीवनसंगिनी 'सुमन' का, जिसके अगाध विश्वास, परिपक्वता और निश्छल साथ ने मेरी ज़िंदगी को एक बेहद खूबसूरत और सुरक्षित किनारा दिया।

आशा करता हूँ कि जब आप समर और अंजली के इस सफ़र से गुज़रते हुए इसके आखिरी ताले तक पहुँचेंगे, तो आपका दिल भी प्रेम, मर्यादा और स्वाभिमान के इस पवित्र रिश्ते को गहराई से महसूस कर पाएगा।

सुरेन्द्र कुमार 'साहिल'

फिर से अजनबी 7