Antarswar: three dashkiye safar अन्तरस्वर : तीन दशकीय सफर


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pअन्तरस्वर : तीन दशकीय सफर मेरे जीवन की उन अनुभूतियों, संवेदनाओं और विचारों का संकलन है, जो समय-समय पर मेरे अंतर्मन में जन्म लेते रहे और सहज ही शब्दों का रूप धारण करते गए। यह कृति किसी पूर्व निर्धारित योजना का परिणाम नहीं, बल्कि जीवन के प्रवाह के साथ बहते हुए उन भावों की अभिव्यक्ति है, जिन्हें मन ने जब भी अनुभव किया, उन्हें उसी क्षण लिख लिया।मेरे लेखन की यह यात्रा वर्ष 1993 में प्रारम्भ हुई, जब मैं नवमी कक्षा का विद्यार्थी था। उसी समय मन में उठते भावों को शब्दों में ढालने की एक सहज शुरुआत हुई, जो समय के साथ कभी धीमी पड़ी तो कभी तेज प्रवाह बनकर उभर आई। ऐसा भी अनेक बार हुआ कि वर्षों तक एक भी पंक्ति लिखी नहीं जा सकी, और कभी ऐसा समय भी आया जब लगातार लेखन का सिलसिला चलता रहा। इस प्रकार यह यात्रा किसी नियमित क्रम में नहीं, बल्कि जीवन की परिस्थितियों और मनःस्थितियों के अनुसार चलती रही।इस पुस्तक में कुण्डलियाँ, कविताएँ, गज़लें, शेर, क्षणिकाएं आदि विविध साहित्यिक विधाओं की रचनाएँ संकलित हैं। इनका विषय-विस्तार भी जीवन की भाँति व्यापक और बहुरंगी है—कहीं प्रेम और करुणा की कोमल छाया है, कहीं समाज का यथार्थ, कहीं आत्मचिंतन की गंभीरता, तो कहीं समय की परिवर्तनशीलता की झलक।इन रचनाओं की यात्रा भी उतनी ही सहज और अनायास रही है। सच तो यह है कि कभी यह कल्पना भी नहीं की थी कि यूँ ही लिखते-लिखते भावों के ये छोटे-छोटे बीज एक दिन इतने विस्तार ले लेंगे कि एक पुस्तक का रूप धारण कर लेंगे। यह संग्रह किसी योजना का परिणाम नहीं, बल्कि समय के साथ संचित होती गई उन अनुभूतियों का फल है, जो अनजाने ही शब्दों में ढलती चली गईं।ये रचनाएँ किसी विशेष साधन या व्यवस्था की प्रतीक्षा में नहीं रहीं। कभी डायरी के पन्नों पर, कभी काग़ज़ के छोटे-छोटे पुर्जों पर, तो कभी जो भी उपलब्ध हुआ, उसी पर मन की बात लिख दी गई। कुछ रचनाएँ सहेज ली गईं, कुछ समय के साथ बिखर गईं और कुछ अनजाने में खो भी गईं। इस बिखराव में भी एक सच्चाई और सहजता है—क्षण की अनुभूति की सजीव अभिव्यक्ति।मैं यह विनम्रतापूर्वक स्वीकार करता हूँ कि मैं विभिन्न साहित्यिक विधाओं के लेखन की बारीकियों का पूर्ण ज्ञाता नहीं हूँ। इन रचनाओं में शास्त्रीय नियमों का कठोर आग्रह नहीं, बल्कि मन के भावों की सच्ची और सरल अभिव्यक्ति प्रमुख रही है। तुकांतता का ध्यान रखते हुए शब्दों को संवारने का प्रयास अवश्य किया गया है, परंतु यह प्रयास भी भावों की स्वाभाविकता को बनाए रखते हुए ही किया गया है।वास्तव में, लेखक या कवि होना मेरे लिए न तो कोई विशेष उपलब्धि है और न ही किसी प्रकार का अभिमान या अर्जन। यह केवल एक सहज प्रवृत्ति है—अंतर में उठते भावों को शब्द देने की। मेरी रचनाओं का केंद्र सदैव भाव ही रहे हैं; शिल्प या प्रसिद्धि की चाह कभी उद्देश्य नहीं रही। जो कुछ भी लिखा गया, वह मन की सच्ची अनुभूति और आत्मिक संतोष के लिए लिखा गया है।समय के साथ अभिव्यक्ति के माध्यम भी परिवर्तित होते गए। पिछले कुछ वर्षों में व्हाट्सएप, फेसबुक जैसे डिजिटल मंचों ने इन भावों को साझा करने का एक नया आयाम दिया। वहाँ लिखी और सहेजी गई अनेक रचनाएँ इस संग्रह का हिस्सा बन सकीं। फिर भी आज भी कई रचनाएँ अलग-अलग कॉपियों और पन्नों में बिखरी हुई हैं, जिन्हें एकत्र करना सहज नहीं है।p