Begampura ka shilpi बेगमपुरा का शिल्पी
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डॉ० भीम राव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा में डी.लिट्. की मौखिक परीक्षा लेने आए हरिसिंह गौड विश्वविद्यालय, सागर के प्रोफेसर आनन्द प्रकाश त्रिपाठी से परीक्षा के बाद मुलाकात हुई। उन्होंने "गुरु रविदास की सांस्कृतिक शब्दावली का अध्ययन" शोध विषय पर किए गए मेरे शोध की भूरी-भूरी प्रशंसा की।
उस समय मेरा पहला उपन्यास "दादा फौजी" प्रकाशित हो चुका था। डी. लिट्. की मौखिक परीक्षा लेने आए तीनों परीक्षकों को, जिसमें मेरे गुरुवर प्रोफेसर लालचन्द गुप्त 'मंगल' भी थे, उपन्यास की प्रतियां भेंट की। उपन्यास लिखने में मेरी रुचि को देखते हुए उन्होंने कहा "गुरु रविदास की वाणी पर समीक्षात्मक कार्य बहुत हो रहा है, लेकिन अभी तक उन पर कोई उपन्यास नहीं लिखा गया। हम चाहते हैं कि आप गुरु रविदास पर उपन्यास लिखो। आपने "दादा फौजी" उपन्यास भी लिखा है। इस कड़ी को आगे बढ़ाओ।"
गुरु रविदास जी पर उपन्यास लिखने का मन बनाया परन्तु महाविद्यालय के कार्यों की व्यस्तता के कारण उपन्यास लिखने का समय ही नहीं मिल पा रहा था। महाविद्यालय के कुछ ज्च्वाकांक्षी, स्वार्थी और दगाबाज सहयोगियों ने, जिसमें मेरी ही जाति की दो महिलाएं थी, ऐसा पड्यन्त्र रचा कि सेवानिवृति तक चाहकर भी लेखन कार्य के लिए समय नहीं मिल पाया। महिला सहयोगियों द्वारा रचे गए पड्यन्त्र से मुझे "सात साल तक उपन्यास की पूरी पृष्ठभूमि जरूर मिल गई।
समय बीतता गया। "सात साल तक" उपन्यास पूरा हुआ। हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी की ओर से "सात साल तक" उपन्यास को हिन्दी श्रेष्ठ कृति पुरस्कार-2022 से पुरस्कृत किया गया। फिर जब भी तीसरा उपन्यास लिखने बारे मन में आता, तो प्रोफेसर आनन्द प्रकाश त्रिपाठी जी की बात मस्तक पर छा जाती।
गुरु रविदास पर उपन्यास लिखना है तो तत्कालीन धार्मिक, सामाजिक और राजनीति के इतिहास का वर्णन तो आएगा ही। इतिहासकारों की नजर में उपन्यास इतिहास का शत्रु है। मैं भी ये मानता हूँ कि उपन्यास को विशुद्ध इतिहास मान लेना ठीक नहीं। उपन्यास केवल उपन्यास ही होता है, इतिहास नहीं।
प्रस्तुत उपन्यास में गुरु रविदास ने एक निम्न कहे जाने वाली चमार जाति में जन्म और पालन-पोषण पाकर जिस गहराई से अपने समकालीन भारत की स्थिति को भाँपा, भविष्यत भारत की कल्पना की, वह अवर्णनीव है। अपनी मृदुल-वाणी और सत्कर्मों द्वारा बेगमपुरा की संकल्पना को साकार किया। काल-विशेष के चरित्रों का चित्रण करते समय तत्कालीन समय की प्रमुख घटनाओं व जनश्रुतियों को भी चरित्रों के मनोनिर्माण में आवश्यक मानकर उन्हें समाहित किया गया है।
'कर्म ही धर्म' और 'काम ही पूजा' के मंत्र से नायक समाज में जागृति लाकर श्रम की महत्ता और सद्भक्ति के बलबूते पर ब्राह्मणवाद के किले को ध्वस्त करते हैं। सर्वहारा वर्ग को स्वाधीनता के लिए प्रेरित कर नारकीय जीवन से बाहर निकालने के लिए विवेकी और कर्मयोगी बनने की राह दिखाते हैं।
अन्त में, मैं उन सभी विद्वानों के प्रति कृतज्ञ हूँ जिनकी रचनाओं तथा विचारों से उपन्यास के प्रणयन में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहायता मिली। अपनी समस्त त्रुटियों को पूरी विनम्रता के साथ स्वीकार करते हुए प्रस्तुत उपन्यास सुधीजन के हाथों में रखते हुए इस आशा के साथ हर्ष का अनुभव हो रहा है कि उपन्यास कैसा लगेगा? यदि मुझे समीक्षक और आलोचकों के विचार जानने को मिले तो मैं उनका आभारी हूँगा।

रमेश मेहरा

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