"विप्राः बहुधा वदन्ति” आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा के व्यक्तित्व का बहुपक्षीय आकलन करती हुई पुस्तक है। इस पुस्तक के सम्पादक हैं जाने-माने सगीतज्ञ डॉ. आदिनाथ उपाध्याय और मैं सहयोगी सम्पादक की भूमिका में इससे जुड़ा हुआ हूँ। बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा डॉ. आदिनाथ की दृष्टि में 'इस युग के शिखर पुरुष हैं, एक महामानव' ।
आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा के लेखन के बारे में चर्चा करते हुए डॉ. आदिनाथ उपाध्याय कहते हैं-
"इनके लेखन की एक बड़ी विशेषता रही है कि कहने को तो ये निबंध हैं पर इनके भीतर इन्द्रधनुषी पुष्प गुच्छ की भांति साहित्य की अन्य विधाएँ भी गुथी-गुथी सी चलती हैं। यानी इनके निबंधों में कहीं कहानी, कहीं कविता तो कहीं मुक्तक की छटा दृष्टिगोचर होती है, कहीं-कहीं तो लगता है लेखक मानों पाठक को अपनी आत्मकथा से ही रसाप्यायित करने लगा हो। लेखन की ऐसी बहुरंगी छटा साहित्य-जगत में कम ही देखने को मिलती है। अर्थात बेजोड़ विविधता, बेजोड़ कल्पना शक्ति है ओझा जी के निबंध लेखन में। नित-नूतन, नित नव-नवोन्मेष ।"
आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत और भोजपुरी के मर्मज्ञ विद्वान रहे हैं और उनका जीवनानुभव बड़ा व्यापक और विशाल, तथा उनकी चिंतन-मननशीलता गहन-गंभीर। यही कारण है कि उनके निबंधों में जीवन के इंद्रधनुषी भाव-भंगिमाएं, छवि-छटाएं, रसरंग प्राप्त होते हैं। इनकी दृष्टि मूलतः मौलिक और समग्रतः मानवीय है इसलिए इनके निबंधों में एक खास तरह का उदात्तशील संस्कार प्राप्त होता है जो मानव जीवन को परमोत्कर्ष, परम श्रेयस की ओर प्रेरित करता है। पाठकों की चेतना को उर्ध्वमुखी बनाने में, उनके कायाकल्पिक भावान्तरण करने में इनकी रचनाएँ बड़ी सहायक सिद्ध होती हैं और सच पूछिए तो इसी में इनका लेखन अपना वैशिष्ट्य और सार्थकत्व प्राप्त करता है।